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Friday, March 11, 2011

जाला

 छुपा कर रखा था मन में कुछ सवालों को ,
 सहेज कर रखा था कुछ उलझे ख्यालों को , 
 लगता है बस थमी सी चल चलती है जिंदगी 
                                                 सालों से  ,
 कयूं मकड़ी सी उलझी लगती है अपने ही 
                                                 जालों में ?
 ये जाल अपने ख्यालों से जो हमने बुना है  ,
 कई सवाल जिनमे खुद को बे वजह ही फंसा रखा है |
 न जाने , कब वो दिवाली आएगी ?
 जब कोई पाक रूह ये जाला हटाएगी....
 अपनी ही कैद में फंसी जब ये जिंदगी , 
 खुले पंछीकी तरह बेख़ौफ़ हवा में गोते लगाएगी |

 

Monday, October 18, 2010

मेला

रंगबिरंगी दुनिया का मेला देखन 
छुटकी चल दी ..............................
माँ की उंगली , पिता का साथ लिए 
भीड़ में वो आगे बढ़  ली ..............
क्या रोशनी ,क्या चहल -पहल ,
क्या रंग , नज़ारे  अलग - अलग ,
हैरान  हो ये सब छुटकी   देखन  लगी  |

माँ ! ये गुडिया , बाबा ! ये झूला 
मुझे भी है लेना ..........................
ना  बेटी ! ये न किसी काम का, 
फिर कभी ले लेना.........................
चलो , फिर कभी इस  गुडिया से 
मै खेलूंगी .......................................
अगली बार ही सही , कोई बात नहीं 
मै ये झूला ले लूंगी |

रुको माँ ,इसे  पकड़  कर तो मै 
देख लूँ ................................. 
बाक़ी  बच्चों को झूला लेते देख ही 
मै ऑंखें  सेक लूँ ....................
मन में  ये सोच छुटकी बोली यूं ,
कोई बात नहीं , माँ -बाबा  मै 
बड़ी सयानी हूँ .................. 
जब अगली बार  आप  के खेत फसल 
अच्छी होगी , 
तब ये गुडिया भी मेरी होगी  |

इतना कह छुटकी आगे  मेले में  बढ़ दी ,
और माँ -बाबा  की  ऑंखें  आंसू से भर दी ,
क्यों दिखाई  रंगीन दुनिया इतनी.................
ये भोली "लाडो" को..................................
जो इतनी जल्दी गयी वो सयानी  हो |


फिर छुटकी रंग -बिरंगी  दुनिया के मेले
में ग़ुम हो गयी......................................
आगे बढ़ चली वो भीड़ में ,
मन में सपने संजोये  कई ...................
 इक दिन जरूर वो गुडिया  मुझे 
मिलेगी कभी |





                                                                       


Tuesday, September 7, 2010

दो टूक

उजड़ा  मेरा आशियाना
ना कोई रहा  ठिकाना
ऐ मेरे खुदा ..............

गुजरा वो था ज़माना
जब अपना भी था इक ठिकाना ,
ज़लज़ला ऐसा आया ,
 आंधी ऐसी चली,
पंच्छी गिरा डाली से...
आशियाँ उड़ा ले साथ चली ........
ऐ मेरे खुदा ..............

कर रहमत अपने बन्दों पर ,
न जर न जेवर , न रहा कोई घर
कोई खता हुई मुझसे जो गर
ऐ मेरे खुदा ................

बीवी की आँखें हैं नम,
दिल में लिए सिसकता इक गम ,
भूख से मासूम रहे हैं बिलख ,
मै हूँ बेजार और बेबस ,
क्या करूँ ,किस से लडूं
तू ही तो है जिस से फ़रियाद  करूँ,
ऐ मेरे खुदा .....................

बंदा क्या लाया थे ,जो खोएगा
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जब होग्री तेरी रहमत
तू अपने आप ही देगा |
ऐ मेरे खुदा ...............

क्या चाहिए मुझ गरीब को ,
मेरे बिखरे नसीब को,
इक छोटी  सी दुनिया ,
जिसमे हो  इक अपनी छत
दो टूक रोटी, दो पल चैन |
समझ मेरा भी दर्द.......कर कुछ मेरी मदद .
ऐ मेरे खुदा .....................